Ashwini Vaishnav biography in Hindi.अश्विनी वैष्णव की जीवनी।

पूर्व नौकरशाह अश्विनी वैष्णव का नरेंद्र मोदी सरकार में बतौर कैबिनेट मंत्री शामिल होना बहुत सारे लोगों को चौंका गया, हालांकि उन्होंने दो साल पहले भी ओडिशा से भाजपा के टिकट पर राज्यसभा का चुनाव जीत कर सबको सकते में डाल दिया था क्योंकि पार्टी के पास विधायकों की संख्या इतनी नहीं थी कि वह चुनाव जीत सकें। 

उनका नाम संभावित अनुसूची में शामिल किया गया था. उड़ीसा से राज्यसभा सांसद अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट मंत्री पद की शपथ ली है. उन्हें रेलवे, संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया गया है. इससे पहले रेलवे मंत्रालय पीयूष गोयल संभाल रहे थे.

अश्विनी वैष्णव राजस्थान के जोधपुर के रहने वाले हैं. वे 1994 बैच के आईएएस अफसर रह चुके हैं. जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फिर आईआईटी कानपुर से उन्होंने एमटेक किया. अमेरिका के पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय से उन्होंने फ़ायनेंस में एमबीए किया.

ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी रहते हुए वैष्णव को बालासोर का डीएम बनाया गया. ये बात अब से बीस साल पहले की है. उन दिनों ओडिशा में भयंकर समुद्री तूफ़ान आया था. हज़ारों लोग की मौत हुई थी. बालासोर के डीएम रहते हुए राहत और बचाव के काम पर उनकी बड़ी तारीफ़ हुई. जब नवीन पटनायक ओडिशा के सीएम बने तो उन्हें कटक का कलेक्टर बनाया गया.

अश्विनी वैष्णव फिर प्रधानमंत्री ऑफ़िस में आ गए. अगस्त 2003 में वे पीएम अटल बिहारी वाजपेयी डिप्टी सेक्रेटरी बने. आठ महीनों तक वे इस पद पर बने रहे. वाजपेयी जब सत्ता से हट गए तब वे उनके निजी सचिव बन गए. इसके बाद वे क़रीब डेढ़ सालों तक गोवा पोर्ट के डिप्टी चेयरमैन रहे.

फिर वैष्णव दो सालों के लिए स्टडी लीव पर चले गए. विदेश से लौटे तो आईएएस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद वे कई प्राइवेट कंपनियों में वाइस प्रेसिडेंट से लेकर डायरेक्टर के पदों पर नौकरी करते रहे.

वाजपेयी सरकार में पीएमओ में तैनात रहते हुए अश्विनी वैष्णव ने बीजेपी के बडे नेताओं से संपर्क बना लिया, नरेंद्र मोदी भी उनमें से एक थे. वैष्णव जहां भी रहे, मोदी के लगातार संपर्क में रहे. इसी दौरान ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से भी उनकी नज़दीकियां बढ़ती गईं.

बीजेपी और बीजेडी का गठबंधन नौ सालों तक बना रहा. कहते हैं कि अश्विनी वैष्णव की भी इसमें अहम भूमिका रही. बीजू जनता दल और बीजेपी के बीच उन्होंने कई बार सेतु का काम किया.

बिना किसी पद पर रहते हुए वैष्णव की गिनती पटनायक के क़रीबी लोगों में होती रही है. यही वजह है कि बीजेडी भी उन्हें अपने कोटे से राज्य सभा भेजने को तैयार थी. लेकिन बीजेपी ने तो उन्हें अपना बनाने का फ़ैसला कर लिया था.

नवीन पटनायक चाहते तो राज्यसभा के लिए वे तीनों सीटें जीत सकते थे. 147 सदस्यों वाली ओडिशा विधानसभा में बीजेडी के 111 और बीजेपी के 23 विधायक हैं. लेकिन बीजू जनता दल ने दो ही उम्मीदवार उतारे. तीसरी सीट के लिए पटनायक ने बीजेपी का समर्थन कर दिया. ये असंभव इसी लिए संभव हो पाया क्योंकि बीजेपी ने अश्विनी वैष्णव को राज्य सभा का टिकट दे दिया.

कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी ने बीजेडी के साथ डील कर लिया लेकिन सच तो कुछ और है. ये सब अश्विनी वैष्णव के मैनेजमेंट का कमाल है. उनके ही बैच के एक आईएएस अधिकारी बताते हैं कि अश्विनी मिलनसार क़िस्म के इंसान हैं. लेकिन वे बडे महत्त्वाकांक्षी है. 

वैष्णव का प्रारंभिक जीवन।

परअश्वनी वैष्णव का पैतृक गांव पाली जिले में जीवंत कला ग्राम है. उनके पिता दाऊलाल वैष्णव 1966 में पढ़ने के लिए पाली से जोधपुर आ गए थे. इसके बाद दाऊलाल जोधपुर के ही हो गए. दाऊलाल की दो संतानें हैं अश्वनी और आनंद. अश्वनी शुरुआत से ही पढ़ाई में होनहार थे. उन्होंने 1986 में 12वीं क्लास टॉप की थी.

उसके बाद में एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक किया और उसके बाद मास्टर्स की डिग्री आईआईटी कानपुर से की. वे भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुने गए. पूरे भारत में उनका 26वां नंबर था. उनके पिता ने कहा था कि वे जो भी करें, देश हित में करें. राष्ट्र के लिए कार्य करें.

प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर उनका कार्यकाल।

प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उन्होंने बालेश्वर और कटक जिलों के कलेक्टर की जिम्मेदारी निभाई। साल 1999 में आए भीषण चक्रवात के समय उन्होंने बतौर नौकरशाह अपने कौशल का परिचय दिया और उनकी सूचना के आधार पर सरकार त्वरित कदम उठा सकी जिससे बहुत सारे लोगों की जान बची। 

वैष्णव ने 2003 तक ओडिशा में काम किया और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यालय में उप सचिव नियुक्त हो गए। वाजपेयी जब प्रधानमंत्री पद से हटे तो वैष्णव को उनका सचिव बनाया गया। आईआईटी से पढ़ाई कर चुके वैष्णव ने 2008 में सरकारी नौकरी छोड़ दी और अमेरिका के व्हार्टन विश्वविद्यालय से एमबीए किया।

वापस लौटने के बाद उन्होंने कुछ बड़ी कंपनियों में नौकरी की और फिर गुजरात में ऑटो उपकरण की विनिर्माण इकाइयां स्थापित कीं। इसी साल अप्रैल में उन्हें भारतीय प्रेस परिषद का सदस्य नामित किया गया था। 

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