हैप्पी हाइपॉक्सिया क्या है? क्यूं कहा जाता है इसे साइलेंट किलर। जानें वजह।

कोरोना महामारी की दूसरी लहर आए दिन ही मरीजों में एक के बाद एक नई बीमारी को जन्म दे रही है। अब तक कोविड की चपेट में आने से सुना था कि इसका लंग्स पर असर पड़ता है लेकिन असल में ये वायरस हमारे पूरे शरीर को खोखला कर रहा है।

इस महामारी की चपेट में आने के बाद किसी के शरीर में खून के थक्के बनने शुरू हो गए तो कोई डायबिटीज का मरीज बन गया। किसी में ब्लैक फंगल इंफेक्शन के लक्षण दिखने लगे तो कोई अपनी गंध और स्वाद खो बैठा। अब इस महामारी की एक और लक्षण सामने आया है जिसका नाम है ‘हैप्पी हाइपोक्सिया’ (Happy hypoxia)।

हाइपोक्सिया क्या है?

कोरोना इंफेक्शन के बाद दुनियाभर के कई मरीजों में एक खास तरह का लक्षण देखा गया. मरीज का ब्लड ऑक्सीजन का लेवल काफी नीचे (70-80) है, लेकिन मरीज को सांस लेने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है. मरीज एक दम सामान्य है. हालांकि शरीर में ऑक्सीजन की कमी लगातार मरीज को नुकसान पहुंचा रही है. दुनियाभर के डॉक्टर इस लक्षण को गंभीरता से लेने की सलाह दे रहे हैं.

आसान भाषा में कहें तो हाइपोक्सिया खून और शरीर की कोशिकाओं में ऑक्सीजन की कमी की स्थिति को कहते हैं. कई बार इससे पूरे शरीर पर असर पड़ सकता है या शरीर के किसी खास हिस्से पर.

अमेरिकी नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन मायो क्लीनिक के अनुसार शरीर की धमनियों में नॉर्मल ऑक्सीजन का स्तर 75 से 100 मिलीमीटर मरकरी (mm Hg) के बीच रहता है. नॉर्मल पल्स ऑक्सीमीटर पर अक्सर 95 से 100 के बीच की रीडिंग सामान्य मानी जाती है.

ऑक्सीमीटर की रीडिंग 90 से नीचे होने पर इसे चिंताजनक माना जाता है. ऐसा होने के बाद इंसान को थकान, कंफ्यूजन, मानसिक दिक्कतें आना शुरू हो जाती हैं. इसकी वजह है ऑक्सीजन का भरपूर तरीके से ब्रेन में न पहुंच पाना. ऑक्सीजन लेवल के 80 से नीचे आने पर शरीर के दूसरे अंगों जैसे किडनी, हार्ट, लीवर आदि पर भी असर पड़ना शुरू हो जाता है.

इसे ऐसे समझिए. जब हम सांस लेते हैं तो खून के साथ ऑक्सीजन शरीर के कोने-कोने में पहुंच जाती है. ऑक्सीजन को खून में पहुंचाने का काम फेफड़ों से शुरू होता है. फेफड़े के ऊपर महीन ब्लड वेसल्स यानी रक्त वाहिनियों का जाल होता है. यह एक नेट की तरह होता है. जब हम सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन फेफड़ों में जाती है.

इस ऑक्सीजन को ही उन रक्त वाहिनियों में एक खास प्रक्रिया द्वारा सोख लिया जाता है. उसके बाद ऑक्सीजन खून के साथ शरीर के हर अंग में पहुंच जाती है.

कोरोना का इंफेक्शन होने पर फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है और भरपूर ऑक्सीजन रक्त में घुल नहीं पाती. इससे शरीर के दूसरे अंग ऑक्सीजन के अभाव में काम करना बंद कर देते हैं.

हाइपोक्सिया की स्थिति अक्सर पर्वतारोहियों में देखी जाती है. ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन की वजह से यह स्थिति पैदा होती है. हालांकि हैप्पी हाइपोक्सिया वाले कोरोना मरीजों की स्थिति पर्वतारोहियों से अलग होती है. उन्हें सांस लेने में भी कोई दिक्कत भी महसूस नहीं होती.

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क्यों कहते हैं इसे ‘साइलेंट किलर’।

हैप्पी हाइपोक्सिया कोरोना की खतरनाक स्टेजों में से एक है। ये बीमारी कोविड मरीज को हार्ट अटैक जैसा झटका देती है और उसे मौत में मुंह में ढकेल देती है।

खास बात ये है कि कोविड मरीज को इस बात का आभास नहीं होता कि वो कब इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गया। कोरोना मरीजों में शुरुआती स्तर पर कोई लक्षण नहीं दिखता। यही वजह है कि हैप्पी हाइपोक्सिया को ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जा रहा है।

युवाओं को क्यों नहीं चलता हैप्पी हाइपोक्सिया का पता।

हैप्पी हाइपोक्सिया की चपेट में मरीज तब आता है जब उसके खून में ऑक्सीजन के स्तर का बहुत कम हो जाता है। इसमें मरीज का ऑक्सीजन लेवल 30 से 50 फीसदी तक या इससे भी ज्यादा नीचे गिर जाता है लेकिन पीड़ित को इसका पता भी नहीं चल पाता।

जानकारों का कहना है कि युवाओं की इम्यूनिटी काफी स्ट्रांग होती है, ऐसे में उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल नीचे भी आ जाता तो उन्हें कुछ महसूस नहीं होता है कि वे साइलेंट किलर हाइपोक्सिया की चपेट में आ चुके हैं।

क्योंकि कोरोना मरीज रहते हुए भी उनमें शुरुआती स्तर पर कोई लक्षण नहीं दिखते या फिर माइल्ड सिम्टम्स होते हैं। वे एक दम हैप्पी नजर आते हैं लेकिन अचानक से उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन कम होने लगता है, जो जानलेवा साबित होने लगता है।

युवाओं की इम्युनिटी मजबूत होती है. उनकी एनर्जी भी दूसरों के मुकाबले ज्यादा होती है. इस वजह से उनकी बर्दाश्त करने की क्षमता भी बुजुर्गों से ज्यादा होती है. अगर उम्र ज्यादा है तो ऑक्सीजन सेचुरेशन का 94% से 90% होना भी महसूस होता है. इसके उलट युवाओं को 80% ऑक्सीजन सेचुरेशन पर भी लक्षण महसूस नहीं होते. वे कुछ हद तक हाइपोक्सिया को बर्दाश्त कर जाते हैं.

कोरोना 85% लोगों में माइल्ड, 15% में मॉडरेट और 2% में जानलेवा हो रहा है. युवाओ में ज्यादातर माइल्ड लक्षण ही देखा जाते हैं. इसलिए वह अस्पतालों में भर्ती करने में देरी करते हैं. चूंकि किसी भी तरह का शारीरिक लक्षण नहीं दिख रहा होता तो कई बार डॉक्टर के पास पहुंचने से पहले ही केस काफी बिगड़ जाता है.

हैप्पी हाइपोक्सिया होने की वजह।

विशेषज्ञों के मुताबिक, हैप्पी हाइपोक्सिया का प्रमुख कारण फेफड़ों में खून की नसों में थक्के जम जम जाते हैं। इस कारण फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है, जिसके चलते ब्लड में ऑक्सीजन सेचुरेशन की मात्रा कम हो जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपोक्सिया के कारण दिल, दिमाग, किडनी जैसे शरीर के प्रमुख अंग काम करना बंद कर सकते हैं।

हैप्पी हाइपोक्सिया के लक्षण (Hypoxia covid symptoms)।

हैप्पी हाइपोक्सिया से पीड़त व्यक्ति के होठों का रंग बदलने लगता है, वो लाल से नीले पड़ने लगते हैं। इसके अलावा त्वचा का रंग भी लाल या पर्पल दिखने लगता है। यहीं नहीं पसीने में भी पीड़ित व्यक्ति का रंग बदला हुआ नजर आता है। ऑक्सीजन का स्तर काफी कम होने पर सांस लेने में परेशानी लगती है।

मस्तिष्क में ऑक्सीजन की कमी से कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं और दिमाग भी चिड़चिड़ा होने लगता है। इसलिए लक्षणों पर लगातार ध्यान देना पड़ता है और जरूरत पड़ने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। क्योंकि अगर आपने इस तरह सिम्टम्स को नजरअंदाज किया तो जान का जोखिम लेना पड़ सकता है।

बचाव के लिए क्या किया जाए?

सीनियर फिजीशियन डॉक्टर अनिल बंसल के मुताबिक

कोरोना मरीजों को पल्स ऑक्सीमीटर पर लगातार अपनी ऑक्सीजन जांचें. हैप्पी हाइपोक्सिया में होठों का रंग बदलने लगता है. वह हल्का नीला होने लगता है. त्वचा भी लाल/बैंगनी होने लगती है. गर्मी में न होने या कसरत न करने के बाद भी लगातार पसीना आता है. यह खून में ऑक्सीजन कम होने के लक्षण हैं. लक्षणों पर नजर रखते हुए, जरूरत पड़ने पर तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए.

कोरोना की पहली लहर से ही लगातार पेशेंट्स पर नजर रखने वाले डॉक्टर विपिन वशिष्ठ कहते हैं

कोरोना मरीज को दिन में कई बार अपना ऑक्सीजन लेवल चेक करना चाहिए. अक्सर युवा और कम लक्षण वाले ऐसा नहीं करते. ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल के 94 फीसदी से नीचे आने को खतरे की निशानी मानें. युवा और कम लक्षण वाले मरीज कई बार कम ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल में भी खुद को आराम में महसूस करता है. इससे हैप्पी हाइपोक्सिया की स्थिति बन सकती है.

इसके अलावा खुद से ली गई दवाएं भी मुश्किल बढ़ा सकती हैं. मिसाल के तौर पर कुछ मरीज बीमार होने के कुछ दिन के भीतर ही बिना डॉक्टर की सलाह लिए ओरल स्टेरॉयड्स लेना शुरू कर देते हैं. ऐसे में शरीर का नेचुरल रेस्पॉन्स घट जाता है. आपका शरीर आपको अलर्ट करने के लिए जो लक्षण देता है, दवाइयों के असर की वजह से आप उन्हें जान ही नहीं पाते.

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