मैं आज भी लिखता हूं

मन की विवेचना को

मन की विवेचना को
काल की तपन को
मैं आज भी लिखता हूं
दर्द और चुभन को
 
मन में निदाघ ताप की
इक लौ जल रही है
इस ताप से नीरसता की
बर्फ पिघल रही है
मैं रात में थका थका
नींद में जगा जगा
मैं आज भी लिखता हूं
दर्द और चुभन को
 
मोह के ये मन मेरा
मोहनी चली गयी
फूल भी खिले न थे
कि टूट हर कली गयी
मैं इस बहार के
बसंती गुबार के
देखता हूं पतन को
मैं आज भी लिखता हूं 
दर्द और चुभन को
 
दावानल की आग से
जल उठा कदम कदम
पथ राख की ठेरी बना
मंजिलें हो गयीं खतम
मैं होलिका की आग बन
प्रहलाद की चिराग बन
सह रहा जलन को
मैं आज भी लिखता हूं 
दर्द और चुभन को
 
शब्द शब्द की कसम में
लफ्ज लफ्ज के वादा में
फंस गया मैं अटूट 
अविदित मर्यादा में
ज्यों जीतने की आश में
फिर से ब्रह्मपाश में 
बांधा हो लखन को
मैं आज भी लिखता हूं 
दर्द और चुभन को
 
जब नयन इंतजार का
पर्याय बन चुके थे
कुछ अटपटे जबाब का
अध्याय बन चुके थे
तब एक दिन सैलाब में
अश्कों के बहाब में
धो दिया नयन को
मैं आज भी लिखता हूं 
दर्द और चुभन को
 
मन की विवेचना को
काल की तपन को
मैं आज भी लिखता हूं 
दर्द और चुभन को

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