नेफ्तली बेनेट कौन हैं? नेफ्ताली बेनेट बायोग्राफी हिंदी में। नेफ्ताली बेनेट की जीवनी।

इजरायल में लंबे समय से सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री  बेंजामिन नेतन्याहू की विदाई तय हो गई है। इस विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ने आखिरकार नई सरकार बनाने को लेकर सहमति जाहिर कर दी है। जिसके बाद अब नेफ्ताली बेनेट का ईजरायल का अगला प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है।

बता दें कि इस साल मार्च में हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका था। चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होन के बावजूद इजरायली राष्ट्रपति रुवेन रिवलिन ने नेतन्याहू को सरकार बनाने और 2 जून तक बहुमत साबित करने का आदेश दिया था।

इजरायल में चल रही सियासी उठापटक के बीच नफताली बेनेट वहां के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो वह इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेंजामिन नेतन्याहू की जगह लेंगे. बेनेट ने लंबे वक्त तक नेतन्याहू के साथ काम किया है और वह खुद को नेतन्याहू से ज्यादा दक्षिणपंथी बता चुके हैं.

कौन हैं नफताली बेनेट ?

49 वर्षीय बेनेट राजनीतिक में आने से पहले टेक एंटरप्रेन्योर रह चुके हैं. एक पूर्व स्पेशल फोर्स कमांडो, बेनेट अमेरिका में जन्मे माता-पिता के बेटे हैं. बेनेट अभी अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ इजरायल के रानाना में रहते हैं.

इजरायल की कट्टर धार्मिक यामिना पार्टी के वह मुखिया हैं। 1967 की जंग में इजरायल की ओर से कब्जाए गए वेस्ट बैंक इलाके के विलय के वह पक्षधर रहे हैं। यहां तक कि उनके सुझाव पर ही नेतन्याहू ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी।

इसके अलावा ईरान को लेकर भी बेनेट अपने कड़े रुख के लिए जाने जाते हैं। नए बने गठबंधन में विचारधारा के स्तर पर तमाम मतभेद हैं। इसके बाद भी सभी दलों ने विवादित मुद्दों को छोड़कर कॉमन इशूज पर फोकस करने का फैसला लिया है। कोरोना वायरस संकेट के चलते पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर सभी दल फोकस कर सकते हैं।

फरवरी में बेनेट ने टाइम्स ऑफ इजरायल से कहा था, ”मैं बीबी (नेतन्याहू) की तुलना में ज्यादा दक्षिणपंथी हूं, लेकिन मैं राजनीतिक रूप से खुद को बढ़ावा देने के लिए एक टूल के रूप में नफरत या ध्रुवीकरण का इस्तेमाल नहीं करता हूं.” बेनेट को अर्थव्यवस्था पर अति-उदार माना जाता है और वह ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख के लिए जाने जाते हैं.

टेक स्टार्टअप बेचकर रखा राजनीति में कदम।

बेनेट ने साल 2005 में अपने टेक स्टार्टअप को 145 मिलियन डॉलर में बेचने के बाद राजनीति में कदम रखा, और अगले साल वह नेतन्याहू के चीफ ऑफ स्टाफ बन गए, जो उस समय विपक्ष में थे.

बेनेट ने 2006 और 2008 के बीच नेतन्याहू के लिए वरिष्ठ सहयोगी के रूप में काम किया. हालांकि, नेतन्याहू के साथ संबंधों में खटास आने के बाद उन्होंने नेतन्याहू की लिकुड पार्टी छोड़ दी.

नेतन्याहू का साथ छोड़ने के बाद, बेनेट 2010 में येशा काउंसिल के प्रमुख बने, जो ‘कब्जे वाले वेस्ट बैंक’ में यहूदियों के बसने की लॉबी करती है.

2012 में बेनेट ने धुर दक्षिणपंथी ज्यूइश होम पार्टी की कमान संभाली, जो उस वक्त बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही थी.

इस बीच, 2018 में बेनेट ज्यूइश होम पार्टी की यामिना पार्टी के तौर पर रीब्रैंडिग कर चुके थे. नेतन्याहू सरकार से बाहर आने के बाद बेनेट ने, 2020 में कोरोना वायरस महामारी के कहर के बीच, स्वास्थ्य संकट पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी दक्षिणपंथी बयानबाजी को कम कर दिया.

उन्होंने नवंबर में आर्मी रेडियो से कहा था, “अगले सालों में हमें राजनीति और फिलिस्तीनी स्टेट जैसे मुद्दों को अलग रखना होगा और कोरोना वायरस महामारी पर नियंत्रण पाने, अर्थव्यवस्था को ठीक करने और आंतरिक दरारों को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा.”

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नेफ्टली बेनेट्ट से जुड़े विवाद।

इजरायल में मिलिटरी सर्विस अनिवार्य है. इसी के तहत 1990 में वो कमांडो ग्रुप में शामिल हुए. बेनेट ने लेबनान में इजरायल के कई मिलिटरी ऑपरेशंस में हिस्सा लिया. 1996 में एक ऑपरेशन के दौरान वो सैनिकों की एक टुकड़ी लीड कर रहे थे.

इसी दौरान उन्होंने यूनाइटेड नेशंस की एक बिल्डिंग पर हमला करने का आदेश दिया था. इस हमले में 102 आम नागरिक मारे गए थे. बेनेट पर आरोप लगता है कि उन्होंने उस वक़्त सही फ़ैसला लेने में देर कर दी. ये आरोप आज भी चुनाव के दौरान उनके ऊपर लगाए जाते हैं.

अब तक राजनीतिक दृष्टिकोण से क्या क्या हुआ ?

इजरायल की संसद का नाम है, क्नेसेट. इसमें कुल सदस्यों की संख्या होती है – 120. सरकार बनाने के लिए ‘हाफ़ प्लस वन’ का फ़ॉर्म्यूला लागू होता है. मतलब अगर किसी पार्टी या गठबंधन के पास 61 सदस्यों का समर्थन है, तो वो सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है. इजरायल के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी पार्टी ने अकेले दम पर सरकार बनाई हो. ये परंपरा इस बार भी चल रही है.

30 मई तक याया लापिड ने 51 सीटें जुटा लीं. अब ज़रूरत थी 10 और सीटों की. उसी शाम यमीना पार्टी के मुखिया नफ़्ताली बेनेट ने अपने ऐलान से सबको चौंका दिया. बेनेट ने अपने पुराने बॉस बेंजामिन नेतन्याहू का ऑफ़र ठुकरा दिया था. क्या था ऑफ़र?

नेतन्याहू और बेनेट साथ मिलकर सरकार बनाएंगे. रोटेशन के आधार पर पीएम की कुर्सी दोनों के बीच शेयर होगी. बेनेट इसके लिए राज़ी नहीं हुए.

उन्होंने सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का नया सूत्र खोज लिया था. बेनेट ने कहा कि वो याया लापिड के गठबंधन में शामिल होंगे. बेनेट के प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद नेतन्याहू भी मीडिया के सामने आए.

उन्होंने कहा कि बेनेट जो समझौता कर रहे हैं, वो देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है. उन्होंने यमीना पार्टी के सांसदों से सरकार में शामिन न होने की अपील भी की. हालांकि, इससे नेतन्याहू को कोई फायदा नहीं हुआ.

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