राजेश पायलट (Rajesh Pilot) बायोग्राफी । राजेश पायलट की जीवनी।

कौन थे राजेश पायलट?

राजेश पायलट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सबंध एक राजनेता है।उसका नाम था राजेश्वर प्रसाद बिधूरी जो बाद में राजेश पायलट के नाम से मशहूर हुआ। 1974 में उनकी रमा पायलट से शादी हुई।वे पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा राजस्थान के दौसा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से कई बार सांसद रहे है।

राजेश पायलटजी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय वायुसेना कि तरफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परंतु जन सेवा की भावना से प्रेरित होकर वायुसेना से इस्तीफा देकर राजनीति में प्रवेश किया था। 1980 में भरतपुर से सांसद चुने गये और 1984,1991,1996,1998 एवं 1999 दौसा से सांसद चुने गये। 20 साल तक सांसद रहे।

जब 1984 में राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने उन्हें भूतल राज्यमंत्री बनाया। उत्तरपूर्व और कश्मीर दोनों राजेश पायलट के बहुत प्रिय विषय थे। कश्मीर में सामान्य स्थिति लाने के लिए उन्होंने अपनी तरफ़ से काफ़ी कोशिश की., हाँलाकि वहाँ उन पर कई हमले भी हुए।

राजेश पायलट को भारतीय राजनीति में अभी बहुत कुछ करना था लेकिन मात्र 55 वर्ष की आयु में एक सड़क दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया. उस समय वो गाड़ी को खुद ड्राइव कर रहे थे.

राजेश पायलट का राजनैतिक सफर

साल 1979 में इन्होने भारतीय वायुसेना से इस्तीफा दे दिया और समाज सेवा करनी शुरू कर दी। जब इस्तीफे के बाद सियासत की शुरुआत की बारी आई इन्होने पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रा गाँधी से मुलाकात कर बागपत सीट से चुनाव लड़ने की ख्वाहिश ज़ाहिर की यह नाम सुनकर इंदिरा गाँधी चौंक गयी। क्योकि यह सीट उस समय के प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की सीट थी जो एक जाट बहुल्य इलाका माना जाता था।

तब इंदिरा गाँधी ने पायलट से पूछा के वो जाटो का इलाका है और तुम गुर्जर ‘डर नहीं लगता वहां हिंसा हो सकती है, लाठीया भी चल सकती है। तब राजेश पायलट ने जवाब दिया – ‘मैडम, जब पाकिस्तान के बम और मिसाइल भी नहीं डरा पाए, तो अब क्या डरूंगा। इंद्रा गाँधी पायलट से प्रभावित होकर मुस्कुरा कर उन्हें विदा कर दिया। इसके बाद जब यूपी से चुनाव लड़ने वालो की अंतिम सूचि में अपना नाम न पाकर निराश हो गए और अपने गांव लौटकर खेती करने लगे।

फिर एक दिन किसी से सुचना मिली के इंद्रा गाँधी को सभी की बात सुन्नी पड़ती है इसलिए वो चाहकर भी उन्हे टिकिट नहीं दे पायी। जब इंद्रा गाँधी वहा से हैदराबाद के लिये निकल रही थी तो पायलट अपनी पत्नी दया के संग उनसे मिलने एयरपोट पहुंच गए इंद्रा गाँधी सबसे मिलती हुई आखिर में उन तक पहुंचीं और नमस्कार करके उनकी तरफ मुस्कुरा दिया फिर ‘हूं’ कह कर अपने प्लेन की तरफ बढ़ चलीं अगली ही सुबह उन्हें संजय गाँधी के दफ्तर से फ़ोन आया और राजेश पायलट को मिलने बुलाया और राजस्थान के भरतपुर जिले से चुनाव लड़ने के लिये बोला। वही से राजेश पायलट का राजनीति में सफर की शुरुआत हो चुकी थी।

उसके बाद राजेश पायलट ने 1984 में राजस्थान के दौसा जिले से सांसद का चुनाव जीता। राजीव गाँधी देश के प्रधानमंत्री बने। राजीव ने राजेश पायलट को भूतल राज्यमंत्री बनाया। इसके बाद राजेश पायलट साल 1991,1996,1998 एवं 1999 दौसा से सांसद चुने गये। सिर्फ 1989 में हारे और एक बड़े किसान नेता के रूप में उभरे और राजीव गांधी और नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री रहे।

राजेश पायलेट नाम की कहानी

चुनाव में नामांकन दाखिल करने से पहले ही संजय गाँधी ने राजेश्वर प्रसाद बिधूरी को राजेश पायलट का नाम दिया और पायलट ने अपना नाम नोटेरी में जाकर राजेश्वर प्रसाद बिधूरी से बदलकर राजेश पायलट कर लिया। यही से पायलट नाम उनकी और उनके परिवार की पहचान पुरे देश में बन गयी और ये अभी भी है।

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संजय गांधी को सिखाई थी फ्लाईंग.

एक युवा सांसद. जो अभी एक बरस पहले तक भारतीय वायुसेना में अफसर थे. जिन्होंने 1971 में भारतीय वायुसेना का विमान उड़ाते हुए पूर्वी पाकिस्तान में बम बरसाए थे. अब वह सियासत की जंग जीतना चाहते थे. उनकी किस्मत चमकदार थी. जो कैप्टन रैल्फ उनके पहले इंस्ट्रक्टर थे, उन्हीं ने बाद में इंदिरा गांधी के अनुरोध पर उनके छोटे बेटे संजय गांधी को भी फ्लाइंग सिखाई थी.

1978 में जब हर कोई इंदिरा और संजय को डूबता जहाज मान रहा था, यह नौजवान अफसर उनके साथ खड़ा था. वह खुद तो सेना के अनुशासन में बंधा था, मगर उनकी पढ़ी-लिखी पत्नी यूथ कांग्रेस में सक्रिय थीं. इस कपल की अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं थीं. और 1970-1980 के चुनाव से पहले उसे परवान चढ़ाने का वक्त आ गया. अफसर ने सेना से इस्तीफा दे दिया. उन दिनों वह दिल्ली में तैनात था. सफदरजंग से प्लेन उड़ाता था. पहाड़ी इलाकों के खेतों में दवाइयों के छिड़काव के लिए. उसकी ड्यूटी एग्रीकल्चर एविएशन विंग में थी.

कैसे हुई संजय गांधी से मुलाकात।

सफदरजंग से ही प्लेन उड़ाते थे संजय गांधी. यहीं हुई दोनों में जान-पहचान. फिर जब इस्तीफे के बाद सियासत की शुरुआत की बारी आई, तो पूर्व अफसर इंदिरा से मिलने गया. ख्वाहिश ज़ाहिर की. चुनाव लड़ने की. बागपत से. सीट का नाम सुन इंदिरा चौंकीं. ये निवर्तमान प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की सीट थी. ये जाटलैंड का मक्का था. और ये नया नवेला नेता गुज्जर था. इंदिरा ने कहा, ‘डर नहीं लगता, वहां हिंसा हो सकती है, लाठी चल सकती है.’ नेता का जवाब था- ‘मैडम, जब पाकिस्तान के बमों और मिसाइलों से नहीं डरा, तो अब क्या डरूंगा.’ इंदिरा मुस्कुरा दीं और उसे विदा कर दिया.

वायुसेनाध्यक्ष बनने की ख़्वाहिश

दिलचस्प बात ये है कि स्कूली पढ़ाई ख़त्म होने के बाद राजेश्वर प्रसाद और रमेश कौल के बीच संपर्क ख़त्म हो गया. सालों बाद उनकी मुलाकात तब हुई जब उन्होंने साथ साथ भारतीय वायुसेना के लिए क्वालिफ़ाई किया.

वहाँ भी अपने करियर की शुरुआत में वो वायुसेनाध्यक्ष बनने के ख़्वाब देखा करते थे.

रमेश कौल बताते हैं, “हमें जहाँ ट्रेनिंग दी जा रही थी, वहाँ एक बार उस समय के वायुसेनाध्यक्ष एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह आए. वो हम लोगों के सीने और कंधों पर विंग्स और स्ट्राइप्स लगा रहे थे. राजेश नें कहा, देख लेना एक दिन मैं इस पद पर पहुंचूंगा और मैं भी इनकी तरह लोगों के विंग्स और स्ट्राइप्स लगाउंगा.”

कौल कहते हैं, “वहाँ पर कई वीआईपी अपने विमानों से आया करते थे और राजेश उन्हें देख कर कहा करते थे कि एक दिन तुम लोग भी मुझे इसी तरह रिसीव करोगे. हम लोग उनकी बात सुन कर हंसा करते थे और उसे गंभीरता से नहीं लेते थे.”

राजेश पायलट ने भी की थी बगावत।

सचिन पायलट के स्वर्गीय पिता राजेश पायलट ने कांग्रेस में रहते हुए एक बार कहा था कि पार्टी में जवाबदेही नहीं रही, पारदर्शिता नहीं रही और कुर्सी को सलाम किया जाने लगा. पार्टी को आईना दिखाने वाला राजेश पायलट का यह बयान सिर्फ एक उदाहरण भर था. ऐसे कई मौके आए जब उन्होंने पार्टी में रहते हुए पार्टी को सार्जवनिक तौर पर नसीहत दी. एक बार तो बात यहां तक पहुंच गई जब राजेश पायलट ने सीधे गांधी परिवार को भी चुनौती दे डाली. लेकिन राजनीति में एंट्री से लेकर अपनी अंतिम सांस तक वो कांग्रेस में ही रहे.

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