विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी। V D Savarkar biography हिंदी में।

वीर सावरकर भारत की आजादी के संघर्ष में एक महान ऐतिहासिक क्रांतिकारी थे। वह एक महान वक्ता, विद्वान, विपुल लेखक, इतिहासकार, कवि, दार्शनिक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। वीर सावरकर का वास्तविक नाम विनायक दामोदर सावरकर था। वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के समीप भागपुर गाँव में हुआ था। उनके बड़े भाई गणेश (बाबराव), उनके जीवन की प्रतिष्ठा का एक प्रमुख स्रोत थे। वीर सावरकर बहुत कम उम्र के ही थे, जब उनके पिता दामोदरपंत सावरकर और माता राधाबाई की मृत्यु हो गई थी।

वीर सावरकर ने ‘मित्र मेला’ नाम की एक प्रमुख संगठन की स्थापना की थी, जिसने भारत की “पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता” की लड़ाई में भाग लेने वाले लोगों काफी प्रभावित किया था। मित्र मेला के सदस्य, नासिक में महावारी रोग से ग्रसित लोगों की सहायता भी किया करते थे। बाद में, उन्होंने मित्र मेला को ‘अभिनव भारत’ बुलाया और यह घोषित किया कि भारत को स्वतंत्र होना चाहिए।

विनायक दामोदर सावरकर एक भारतीय राष्ट्रवादी थे, जो एक राजनीतिक दल और राष्ट्रवादी संगठन हिंदू महासभा के प्रमुख सदस्य थे. सावरकर पेशे से वकील और भावुक लेखक थे. उन्होंने कई कविताओं और नाटकों का मंचन किया था. सावरकर ने अपने जबरदस्त संस्कार और लेखन क्षमताओं के साथ अपनी विचारधारा और दर्शन के रूप में कई लोगों को प्रेरित किया, जिसका उद्देश्य हिंदुओं के बीच सामाजिक और राजनीतिक एकता को प्राप्त करना था.

‘हिंदुत्व’ शब्द जो भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का एक रूप है, 1921 में सावरकर द्वारा अपनी एक रचना के माध्यम से लोकप्रिय हुआ था. महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक गंभीर आलोचक, सावरकर पर शुरू में गांधी की हत्या का आरोप लगाया गया था लेकिन बाद में उन्हें बरी कर दिया गया. 1 फरवरी 1966 को, सावरकर ने घोषणा की कि वह मृत्यु तक उपवास रखेंगे और इस कृत्य को ‘आत्मरक्षा’ करार देंगे. जिसके बाद उन्होंने खाना बंद कर दिया और दवाएँ भी त्याग दीं जिससे अंततः 26 फरवरी, 1966 को उनकी मृत्यु हो गई. विनय सावरकर के कार्य ने उन्हें अमर कर दिया.

वीर सावरकर की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनसे, उनकी स्नातक स्तर की डिग्री वापस ले ली। जून 1906 में, वीर सावरकर वकील बनने के लिए लंदन चले गए।उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित ‘1857 में स्वतंत्रता के भारतीय युद्ध’ नामक एक किताब लिखी, जिस पर अंग्रेजों ने रोक लगा दी थी। जब वह लंदन में रह रहे थे, तभी उन्होंने इंग्लैण्ड में भारतीय छात्रों को ब्रिटिश औपनिवेशिक स्वामी के प्रति विद्रोह करने के लिए उत्साहित किया था। उन्होंने भारत की आजादी के संघर्ष में हथियारों का प्रयोग करने का समर्थन किया था।

वीर सावरकर को उनके मुकदमे की जाँच के लिए 13 मार्च 1910 को लंदन से भारत भेजा जा रहा था, हालांकि अभी जहाज फ्रांस के मार्सिलेस में पहुँचा ही था कि वीर सावरकर वहाँ से बचकर भाग निकले, परन्तु फ्रांसीसी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें 24 दिसंबर 1910 को अंडमान में कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में पुस्तकालय की स्थापना उनके ही प्रयासों का परिणाम था। उन्होंने जेल में अशिक्षित अपराधियों को शिक्षा देने की कोशिश की। विठ्ठलभाई पटेल, तिलक और गाँधी जैसे महान नेताओं की मांग पर सावरकर को 2 मई 1921 को भारत में वापस भेज दिया गया।

वीर सावरकर रत्नागिरि जेल में कैद थे और उसके बाद उन्हें येरवादा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था। इन्होंने रत्नागिरी जेल में ही ‘हिंदुत्व’ नामक एक पुस्तक भी लिखी थी। उन्हें 6 जनवरी 1924 को जेल से रिहा कर दिया गया, बाद में उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति को बनाए रखने और सामाजिक कल्याण की दिशा में काम करने के लिए रत्नागिरी हिंदू महासभा की स्थापना की। इसके बाद में वह तिलक द्वारा बनाई गई स्वराज पार्टी में शामिल हो गए और हिंदू महासभा रूप में एक अलग राजनीतिक दल की स्थापना की और इसके अध्यक्ष के रूप में चुने गए।

इस पार्टी ने पाकिस्तान के गठन का विरोध किया। गाँधी जी के हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे भी हिंदू महासभा के सदस्य थे। महात्मा गांधी हत्या मामले में वीर सावरकर पर भारत सरकार द्वारा आरोप लगाया गया था, परन्तु भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष सबित कर दिया था। 26 फरवरी सन् 1966 में 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

वीर सावरकर का जीवन परिचय।

जन्म (Date of Birth) – 28 मई 1883

जन्म स्थान (Birth Place)- बॉम्बे प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत

मृत्यु (Death) – 26 फरवरी 1966

मृत्यु स्थान (Death Place)- बॉम्बे, भारत

पेशा (Profession)- वकील, राजनीतिज्ञ, लेखक और कार्यकर्ता

पिता का नाम (Father Name)- दामोदर सावरकर

माँ का नाम (Mother Name) – राधाबाई

सावरकर भाई-बहन (Brother and Sister) – गणेश, मैनाबाई, और नारायण

पत्नी का नाम (Wife Name) – यमुनाबाई

बच्चे (Children) – विश्वास, प्रभाकर, और प्रभात चिपलूनकर

वीर सावरकर का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Veer Savarkar Birth and early life)

विनायक सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को ब्रिटिश भारत के नासिक जिले के भागुर में हुआ था. उनका जन्म एक ब्राह्मण हिंदू परिवार में हुआ था और उन्होंने अपना बचपन अपने भाई-बहनों, गणेश, मैनाबाई और नारायण के साथ बिताया. हिन्दू-मुस्लिम दंगों के दौरान 12 साल की उम्र में सावरकर ने छात्रों के एक समूह के साथ मुसलमानों की भीड़ को भगा दिया.

दंगों के दौरान उन्होंने अपने गाँव में स्थित मस्जिद को तोड़ने का प्रयास किया था. यह घटना कहीं न कहीं उनकी कट्टर सोच व मुस्लिमों के प्रति वैमनस्य को दर्शाती है लेकिन कुछ इतिहासकार इसकी वजह मुस्लिम लड़कों द्वारा किये गए उत्पात को मानते हैं. बाद में उन्हें ‘वीर’ (साहसी व्यक्ति) उपनाम दिया.

वीर सावरकर का क्रांतिकारी जीवन (Veer Savarkar Revolutionary life)

युवावस्था में सावरकर एक क्रांतिकारी बन गए, उनके बड़े भाई गणेश ने उनके किशोर जीवन में प्रभावशाली भूमिका निभाई. सावरकर ने युवाओं खिलाड़ी के समूह बनाने के लिए खेलों आयोजन किया और इसका नाम रखा मित्र मेला. उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए समूह का इस्तेमाल किया. वे लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल जैसे कट्टरपंथी राजनीतिक नेताओं से प्रेरित थे. इस बीच उन्होंने पुणे में ‘फर्ग्यूसन कॉलेज’ में दाखिला लिया और अपनी डिग्री पूरी की.

फिर उन्हें इंग्लैंड में कानून का अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति की पेशकश की गई और बाद में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उनकी मदद की, जिन्होंने उन्हें कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड भेजा. ग्रे के इन लॉ कॉलेज (Gray’s Inn law college) में दाखिला लेने के बाद सावरकर ने इंडिया हाउस में उत्तरी लंदन में एक छात्र निवास आश्रय लिया. लंदन में सावरकर ने अपने साथी भारतीय छात्रों को प्रेरित किया और फ्री इंडिया सोसाइटी नामक एक संगठन का गठन किया, जिसने भारतीयों को अंग्रेजों से पूरी आजादी के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.

सावरकर ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए ‘1857 के विद्रोह‘ की तर्ज पर गुरिल्ला युद्ध के बारे में सोचा. वह द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस नामक पुस्तक के साथ आए, जिसने भारतीयों को उनकी स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया. हालाँकि इस पुस्तक पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया था, फिर भी इसने कई देशों में बहुत लोकप्रियता हासिल की. सावरकर ने बम बनाने और गुरिल्ला युद्ध करने के लिए एक पुस्तिका भी छापी, जिसे उन्होंने अपने दोस्तों के बीच वितरित किया.

1909 में सावरकर ने कहा कि वह अपने दोस्त मदन लाल ढींगरा को पूरी कानूनी सुरक्षा प्रदान करेंगे, जिन पर सर विलियम हट कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश भारतीय सेना अधिकारी की हत्या का आरोप था.

कालापानी की सजा (Punishment of Cellular Jail)

भारत में सावरकर के भाई गणेश ने इंडियन काउंसिल्स एक्ट 1909 (मिंटो-मॉर्ली रिफॉर्म्स) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. विरोध के बाद ब्रिटिश पुलिस ने दावा किया कि वीर सावरकर ने अपराध की साजिश रची थी और इसलिए उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया. गिरफ्तारी से बचने के लिए सावरकर पेरिस भाग गए जहाँ उन्होंने भिकाजी कामा के आवास पर शरण ली. हालाँकि उन्हें 13 मार्च, 1910 को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

1911 में ब्रिटिश अधिकारियों और फ्रांसीसी सरकार के बीच विवाद को संभालने वाली स्थायी अदालत ने अपना फैसला सुनाया. सावरकर के खिलाफ फैसला आया और उन्हें वापस बॉम्बे भेज दिया गया. जहाँ उन्हें 50 साल की कैद की सजा सुनाई गई.

4 जुलाई 1911 को उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ले जाया गया जहाँ उन्हें कुख्यात सेलुलर जेल (काला पानी) में बंद कर दिया गया. हालाँकि उन्हें लगातार दुराचार और यातना का सामना करना पड़ा. सावरकर ने अपने कुछ साथी कैदियों को पढ़ने और लिखने के लिए जेल में अपने समय का उपयोग किया. उन्होंने जेल में एक बुनियादी पुस्तकालय शुरू करने के लिए सरकार से अनुमति भी प्राप्त की.

जेल में रहकर फैलाया हिंदुत्व.

जेल में रहकर भी उन्होंने अपने हिंदुत्व को पूरे देश में फैला दिया था क्योंकि जेल में बैठकर वे हिंदुत्व:एक हिंदू कौन है नामक वैचारिक पर्चे लिखा करते थे ,और उन्हें चुपचाप जेल के बाहर किसी के हाथ बटवा दिया करते थे, जिससे धीरे-धीरे वे पर्चे पूरे देश में प्रकाशित होते चले गए और सबके बीच फेल गए।

सावरकर के समर्थकों ने उनका बहुत सयोग दिया और हिंदुत्व से कई हिंदुओं को अपनी और आकर्षित करके प्रेरित की वे भारतवर्ष के एक ऐसे देश भक्तों बने जो सब धर्मों को एक समान माने।

वे खुद को हिंदू कहलवाने में बहुत गर्व महसूस करते थे. उन्होंने सदैव अपनी एक राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान बना ली जिसे वे हिंदू के रूप में देखा करते थे। उन्होंने सदैव हिंदू, बोद्ध, जैन और से धर्म के एकीकरण के लिए उपदेश दिए।  मुसलमान और ईसाई लोग उनके खिलाफ थे क्योंकि उन्होंने मुसलमानों और ईसाईयो के अस्तित्व का कभी भी समर्थन नहीं दिया. उन्हें भारत में मिसफिट के नाम से भी जाना जाता था।

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राष्ट्रवाद और हिंदू महासभा (Nationalism and Hindu Mahasabha)

जेल में अपने समय के दौरान सावरकर ने “हिंदुत्व: एक हिंदू कौन है” नामक एक वैचारिक पैम्फलेट लिखा था. यह कार्य जेल से बाहर तस्करी किया गया था और बाद में सावरकर के समर्थकों द्वारा प्रकाशित किया गया. ‘हिंदुत्व’ ने कई हिंदुओं को प्रभावित किया क्योंकि इसने एक हिंदू को’ भारतवर्ष'(भारत) के देशभक्त और गर्वित निवासी के रूप में वर्णित किया. इसने बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म और हिंदू धर्म को एक समान बताया और अखंड भारत (संयुक्त भारत या ग्रेटर इंडिया) के निर्माण का समर्थन किया.

यद्यपि एक स्वयंभू नास्तिक वीर सावरकर ने हिंदू कहलाने में गर्व महसूस किया क्योंकि उन्होंने इसे एक राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान बताया. हालांकि उन्होंने हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के एकीकरण का आह्वान किया लेकिन उन्होंने भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के अस्तित्व का समर्थन नहीं किया. उन्होंने उन्हें भारत में ‘मिसफिट’ कहा था.

6 जनवरी 1924 को सावरकर को जेल से रिहा कर दिया गया. जिसके बाद उन्होंने रत्नागिरी हिंदू सभा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका उद्देश्य हिंदुओं की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना था.

1937 में वीर सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने. उसी समय मुहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस के हिंदू राज के रूप में शासन की घोषणा की थी. जिसने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहले से ही बढ़ रहे तनाव को और खराब कर दिया था. इन संघर्षों ने लोगों को वीर सावरकर के हिंदू राष्ट्र बनाने के प्रस्ताव पर ध्यान दिया, जिसने कई अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ाई.

हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में सावरकर ने द्वितीय विश्व युद्ध में हिंदुओं को ब्रिटिशों का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित किया, जो बदले में हिंदुओं को युद्ध की बारीकियों से परिचित कराने में मदद करेगा.

कांग्रेस और गांधी विचारधारा का विरोध (Opposition to Congress and Gandhi ideology)

वीर सावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और महात्मा गांधी के घोर आलोचक थे. उन्होंने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का विरोध किया और बाद में भारत के विभाजन के लिए कांग्रेस की स्वीकृति पर आपत्ति जताई. भारत को दो अलग-अलग राष्ट्रों में विभाजित करने के बजाय सावरकर ने एक देश में दो राष्ट्रों के सह-अस्तित्व का प्रस्ताव रखा. इसके अलावा उन्होंने खिलाफत आंदोलन के दौरान मुसलमानों के साथ तुष्टीकरण की महात्मा गांधी की नीति की आलोचना की.

इसके अलावा उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के खिलाफ हिंसा का समर्थन करने के लिए गांधी को ‘पाखंडी’ कहा. कुछ लेखों में कहा गया है कि सावरकर ने गांधी को एक संकीर्ण और अपरिपक्व प्रमुख के साथ एक भोले नेता के रूप में समझा था.

वीर सावरकर का धार्मिक और राजनैतिक दर्शन (Religious and political philosophy of Veer Savarkar)

स्वयंभू नास्तिक होने के बावजूद वीर सावरकर ने हिंदू धर्म की अवधारणा को पूरे दिल से प्रोत्साहित किया क्योंकि वह हिंदू धर्म को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में मानते थे और केवल एक धर्म के रूप में नहीं. उनके पास हमेशा हिंदू राष्ट्र या संयुक्त भारत बनाने की दृष्टि थी जो हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों को घेर लेती थी. हालाँकि, उन्होंने उन हजारों रूढ़िवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया जो धर्म से जुड़ी हैं.

सावरकर का राजनीतिक दर्शन काफी अनूठा था क्योंकि इसमें विभिन्न नैतिक, धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांतों के तत्व थे. दूसरे शब्दों में उनका राजनीतिक दर्शन मूलतः मानवतावाद, तर्कवाद, सार्वभौमिकता, प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद और यथार्थवाद का मिश्रण था. उन्होंने भारत की कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी काम किया, जैसे कि जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता जो इस समय के दौरान प्रचलित थी.

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सावरकर के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्य (वीर सावरकर के योगदान)

वीर सावरकर ने खुद को नास्तिक घोषित कर दिया था, इसके बावजूद भी हिंदू धर्म को वे पूरे दिल के साथ निभाते थे। और लोगों को उसकी और बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया करते थे। क्योंकि राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में वे खुद को हिंदू मानते थे और यदि कोई उनको हिंदू बुलाता था तो उन्हें बहुत ज्यादा गर्व महसूस हुआ करता था।

वे कभी भी हिंदुत्व को धर्म के रूप में नहीं मानते थे. बे अपनी पहचान के रूप में हिंदुत्व को देखा करते थे वही उन्होंने हजारों रुढ़िवादी मान्यताओं को खारिज कर दिया था जो हिंदू धर्म से जुड़ी हुई थी, लेकिन व्यक्ति के जीवन में उन मान्यताओं का कोई भी आधार नहीं था।

अपने जीवन का राजनैतिक रूप भी बखूबी निभाया, उन्होंने राजनैतिक रूप में मूल रूप से मानवतावाद, तर्कवाद, सार्वभौमिक, प्रत्यक्षवाद, उपयोगितावाद और यथार्थवाद का एक मुख्य मिश्रण अपने जीवन में अपनाया।

देश भक्ति के साथ-साथ भारत की कुछ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ दोनों ने अपनी आवाज उठाई जैसे जातिगत भेदभाव औऱ अस्पृश्यता जो उनके समय में बह प्रचलित प्रथा मानी जाती थी।

उनका कहना था कि उनके जीवन का सबसे अच्छा और प्रेरित भरा समय वह था जो समय उन्होंने काला पानी की सजा के दौरान जेल में बिताया था।  काला पानी की सजा के दौरान जेल में रहते हुए उन्होंने काले पानी नामक एक किताब भी लिखी थी जिसमें भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के संघर्षपूर्ण जीवन का संपूर्ण वर्णन है।

वीर सावरकर की किताबे (Books of Veer Savarkar)

सावरकर की कुछ सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में मजी जनमथेप, अर्क, कमला, और द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस शामिल हैं. उनके कई कार्य उस समय से प्रेरित थे, जब उन्होंने जेल में बिताया था. उदाहरण के लिए, उनकी पुस्तक काले पानी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुख्यात सेलुलर जेल में भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं के संघर्ष को बयान करती है. उन्हें ‘जयोस्तुते’ और सागर प्राण तामलमाला जैसी विभिन्न कविताओं को कलमबद्ध करने के लिए भी जाना जाता है. उन्हें ‘हटताम्मा’ जैसी कई बोलियों के लिए भी जाना जाता है. जिनमे “दिगदर्शन”, “दूरदर्शन”, “संसद”, “तंकलेखन”, “सप्तक”, “महापौर” और “शातकर” आदि सम्मिलित हैं.

वीर सावरकर की मृत्यु (Veer Savarkar Death & Cause)

अपनी मृत्यु से ठीक पहले विनायक सावरकर ने एक लेख लिखा था, जिसका नाम है “आत्महत्या नहीं आत्मानर्पण” लेख ने मृत्यु (आत्मरपना) तक उपवास पर एक अंतर्दृष्टि दी और कहा कि जब किसी का जीवन का मुख्य उद्देश्य होता है तो उसे अपना जीवन समाप्त करने की अनुमति देनी चाहिए. 1 फरवरी 1966 को सावरकर ने घोषणा की कि वह मृत्यु तक उपवास रखेंगे और भोजन नहीं करेंगे. 26 फरवरी 1966 को उन्होंने अपने बॉम्बे निवास पर अंतिम सांस ली. उनका घर और अन्य सामान अब सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए संरक्षित हैं.

1996 में अभिनेता अन्नू कपूर ने मलयालम-तमिल द्विभाषी फिल्म में विनायक सावरकर की भूमिका निभाई, जिसका शीर्षक कालापानी था. 2001 में सावरकर की बायोपिक जिसका शीर्षक ‘वीर सावरकर’ था, कई वर्षों तक निर्माणाधीन में रही. सावरकर को अभिनेता शैलेंद्र गौड़ द्वारा चित्रित किया गया था. 2003 में भारतीय संसद ने सावरकर को उनके चित्र का अनावरण करके सम्मानित किया.

वीर सावरकर के जीवन पर बनी फिल्में

वीर सावरकर के जीवन पर सन 1996 में पहली फिल्म बनी थी जिसमें अन्नू कपूर मुख्य रोल में नजर आए थे। वह मलयालम और तमिल 2 भाषाओं में रिलीज हुई थी उसका नाम काला पानी था।

2001 में फिर से सावरकर के जीवन पर वीर सावरकर नामक फिल्म बनाना शुरू किया गया जिसे बाद में रिलीज भी किया गया और बेहद पसंद भी किया गया।

वीर सावरकर जो देश का एक ऐसा नेता था जिन्होंने राजनीति के साथ-साथ संस्कृति को भी अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया। यहां तक की हिंदुत्व की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं ही आत्मतर्पण करके खुद को भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया उनका जीवन बेहद प्रेरणादायक जीवन है जिनसे हमें सदैव प्रेरणा लेते रहना चाहिए।

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